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कोविड 19 का विश्व पर प्रभाव

 

● कोविड 19 का विश्व पर दुष्प्रभाव

कोरोना वायरस कई प्रकार के विषाणुओं का ऐसा समूह है जो अदृश्य,विषाक्त एवं जानलेवा होता है। इसके कारण श्वास तंत्र संक्रमण पैदा होता है जो साधारण सर्दी-जुखाम से लेकर अति गम्भीर मृत्यु तक हो सकती है। यह वायरस चीन के वूहान शहर से 2019 में उत्पन्न होने वाला कोरोना वायरस है जिसका नाम WHO ने COVID-19 रखा।

कोरोना वायरस के संक्रमण से उत्पन्न बीमारी COVID-19 ने आज समस्त मानव जाति के जीवन को भयावह स्थिति में डाल दिया है। ऐसा पहली बार नहीं है, इससे पहले भी मनुष्य 18 वीं शताब्दी में प्लेग, 19 वीं शताब्दी में हैजा, 20वीं शताब्दी में स्पेनिश फ्लू जैसी महामारियों का शिकार हुए है। इन महामारियों में लाखों लोग काल के ग्रास बने थे। परंतु मनुष्यों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया जिसके परिणामस्वरूप अब हमें कोरोना जैसे अदृश्य और जानलेवा वायरस से लड़ना पड़ रहा है। 2019 के अंत तक यह बीमारी अस्तित्व में आने लगी और अभी तक इसने लाखों लोगों को अपने चपेट में ले लिया। हम आधुनिक विज्ञान के इस दौर में जी रहे हैं जहां विज्ञान ने अपने नवीनतम खोजों से इतनी तरक्की कर ली है परंतु आज 1 वर्ष और इतने माह बीत गए है और अभी तक कोरोना के कहर से बच पाना मुश्किल है। मनुष्य अपने स्वार्थ लोलुपता की होड़ में इतना अंधा होता चला गया है कि आज उसे अपनी ही गलतियों की सजा भुगतनी पड़ रही है। मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति में प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते हैं जिसका नतीजा सिर्फ आपदाएं एवं महामारी होती है।

धरती माता हज़ारो वर्षो  से अरबों – खरबों जीवों को आश्रय देती आई है, जिनमें मानव, घरेलू जानवर, पौधे और वन्यजीव शामिल हैं। जंगली जीव-जंतु और वनस्पतियाँ इसके पारिस्थितिकी तंत्र, खाद्य श्रृंखलाओं का हिस्सा हैं और इनकी आबादी को पृथ्वी के संसाधनों को नुकसान पहुंचाए बिना प्रकृति द्वारा नियंत्रित किया जाता है। मनुष्य आज पारिस्थितिक शासन को नियंत्रित करता है और विकास और लालच के लिए वैश्विक संसाधनों के साथ खिलवाड़ कर रहा है। मनुष्य ये  भूल जाता हे कि विकास और संरक्षण को संतुलन में रखना, जीविका के सिद्धांत की प्रमुख कुंजी है।

पृथ्वी संसाधनों के अधिक दोहन और अनियोजित विकास से उन समस्याओं की श्रृंखला शुरू हो रही है, जो अब मानव अस्तित्व को खतरे में डाल रही हैं और धरती को नुकसान पहुंचा रही हैं। यदि इस घातक प्रवृत्ति पर  अंकुश नहीं लगाया जाता, तो पृथ्वी इस पर्यावरण-विरोधी मानव साम्राज्य का समर्थन करने की स्थिति में नहीं रहेगी। इसलिए, हमारे अपने अस्तित्व के लिए, हमें अपनी जरूरतों से परे धरती के अपने संसाधनों का बोझ और अधिक दोहन नहीं करना सीखना होगा और हमें अपनी मिट्टी, वनस्पतियों, जीवों, हवा, नदियों, झीलों का सम्मान करना सीखना होगा और सतत विकास के सिद्धांत का सख्ती से पालन करना होगा।

पर्यावरणीय स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए विश्व को एकजुट होने की आवश्यकता है क्योंकि पर्यावरण एक वैश्विक मुद्दा है। यह वास्तव में मानव अस्तित्व के लिए आवश्यक है और ये हमारा कर्तव्य होगा न कि धरती माता पर उपकार।

आज विश्व जिस कोरोना नामक महामारी का शिकार हो रहा है उसका मूल कारण मानव द्वारा प्रकृति के साथ छेड़छाड़ ही है। अपने स्वार्थ के लिए मानव ने जल,हवा को जहां प्रदूषित किया वहीं पृथ्वी का दोहन इतना किया कि उसकी क्षमता कमजोर हो गई। यह कटु सत्य है कि जब जब पृथ्वी पर मानवों का अत्याचार बढ़ जाता है, प्रकृति अपना कहर जरूर बरसाती है। कोरोना महामारी इंसान को स्पष्ट संदेश दे रही है कि अगर अब भी मानव ने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ जारी रखा तो उसका व उसकी भावी पीढ़ियों के भविष्य अंधकारमय ही होगा।

कोरोना महामारी के इस संकट के दौर में स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि लोग अपने ही घरों में कैद हुए कारावास का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। वे न चैन की सांस ले सकते हैं न ही कहीं आ-जा सकते हैं। लेकिन इस स्थिति में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इंसान के घरों में कैद होने से धरती की नैसर्गिकता मुक्त हो रही है। मनुष्यों के घरों में होने के कारण वातावरण अत्यंत स्वच्छ एवं शुद्ध हो रहा है तथा जीव जंतु भी आजादी का अनुभव कर रहे हैं।

कोरोना वायरस ने समस्त मानव जीवन और इतिहास पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है जिसे मानव जाति हमेशा याद रखेगा। एक प्रकार से यह उनके लिए सबक है जिसे शायद ही भूल पाना संभव है। 

इस महामारी से बचने के लिए सरकार ने पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा कर दी तथा सभी विश्विद्यालय, विद्यालय कार्यालय एवं तीर्थस्थलों पर ताला लग चुका है। आज वे सभी धर्माडंबर जो हर परेशानी का हल व्रत रखना,चढ़ावा देना,पूजा-पाठ इत्यादि बताते थे, घरों में छिपे पड़े है। अंधविश्वासों के नाम पर व्यक्ति को लूटने वालों में आज सामने आने की हिम्मत नहीं है। उनका मानना है कि ईश्वर के द्वार कभी बंद नहीं होते, वे हर मुसीबत में हमारे साथ खड़े होते है परंतु स्थिति आज इतनी भयावह है कि ईश्वरों को भी बन्दी बना दिया गया है, लोग आपस में सम्पर्क करने से डरने लगे है। इस महामारी से बचने का एकमात्र उपाय लॉकडाउन एवं सामाजिक दूरी बनाए रखना है। किंतु इस लॉकडाउन की वजह से आर्थिक परिस्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि देश की अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट हुई है। लॉकडाउन के चलते देश के सभी बड़े उद्योग व व्यापक स्तर के तमाम कारोबार ठप्प पड़े हुए हैं। सभी प्रकार के आयात-निर्यात इससे प्रभावित हो गए है। बड़े-बड़े उद्योगपतियों को लाखों का नुकसान हुआ है। यहीं नहीं लॉकडाउन का सबसे अधिक प्रभाव गरीब व निचले तबके के लोगों पर पड़ा है क्योंकि उनकी आय उनके रोज की कमाई पर निर्भर करती है। अपने रोजमर्रा की ज़िंदगी में अभी परिवार का पालन-पोषण करना अत्यंत कठिन हो गया है। अभी आय के सभी साधन बंद है,सभी काम बंद है। कुली मजदूर वर्ग वाले लोगों को भी बहुत तकलीफ के साथ जीना पड़ रहा है। देश की आर्थिक व्यवस्था में गिरावट के कारण महंगाई आसमान छू रहा है और इस महंगाई में गरीबों का जीना मुश्किल हो गया है। कमाई न होने के कारण भविष्य के लिए जमा किये हुए जमा पूंजी राशि को खर्च करना पड़ रहा है परन्तु आखिर कब तक इस तरह वे अपनी गृहस्थी की गाड़ी को चला सकेंगे। ये स्थितियां कब बेहतर होंगी कौन जानता है ? एक तो वे लोग जिनकी कमाई रोज के आय पर निर्भर करती है दूसरे वे लोग जो कमाने के लिए घर गांव परिवार से दूर शहरों में जाकर रहते है। इन परिस्थितियों में उन्हें कोरोना से बचने के लिए अपने घर गांव वापस आना पड़ रहा है ताकि वे परिवार के साथ सुरक्षित रह सके। भले ही घर में अनाज का दाना हो या नहीं वे अपने गांव आपने घरों में परिवार के साथ सुरक्षित महसूस करते हैं। किन्तु कितने ही ऐसे लोग है जिन्हें अपनी वापसी में दिक्कतें आ रही है, लॉकडाउन के कारण सारे यातायात के साधन उप्लब्ध नहीं है अतः उन्हें मीलों तक पैदल चलना पड़ रहा है। अखबारों में कितनी खबरें ऐसी देखने को मिली कि बीच रास्ते में ही लोगों ने दम तोड़ लेना स्वीकारा तथा गर्भवती स्त्री को रास्ते में ही प्रसव पीड़ा का सामना करना पड़ा। इनके सुरक्षा एवं रखरखाव के लिए कुछ भी उपलब्ध नहीं हो पाया। कई लोगों ने कोरोना जैसी बीमारी का फायदा उठाकर लोगों को लूटा। वे कोरोना संक्रमण की झूठी रिपोर्ट बनाकर लोगों को डरा देते है एवं उन्हें क्वारंटाइन में रख देते है,झूठा इलाज चलता है,लोगों के शरीर के अंगों को निकाल लेते है एवं जिंदा लोगों को लाश बताकर उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया। कितनी लाशें तो गायब हो जाती है, अंतिम संस्कार के लिए भी न परिवार को सूचित किया जाता है, और न ही सरकार द्वारा इन सब मामलों के लिए कोई उचित कदम उठाया गया ।

इस समय वहीं धनवान है जो स्वस्थ्य एवं सुरक्षित है और जिन्हें दो वक्त की रोटी मिलने में कोई असुविधा नहीं । क्योंकि स्वास्थ्य से बड़ा कोई धन नहीं है।

विश्व में कोरोना के मामले 21.9 करोड़ के पार हो चुके है, अब तक 45.5 लाख लोगों की मौत हो चुकी है। भारत ,ब्राज़ील,चीन,रूस, अमेरिका जैसे देशों में मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दुनिया के कई देशों में कोरोना का कहर अब भी जारी है। कोरोना के दोनों लहर ने मनुष्यों को संकट में डाल दिया था किंतु चिंताजनक विषय यह है कि इसके तीसरे लहर के कहर से क्या कोई बच भी पाएगा या नहीं ?

निष्कर्ष :- कोविड-19 महामारी ने मानव जाति के अस्तित्व को खतरे में डालकर हमें सर्वोत्तम पर्यावरणीय पाठ पढ़ाया है।  इस महामारी के खिलाफ दुनिया भर में लॉकडाउन ने धरती माता की कायाकल्प और पुनरावृत्ति करने की शक्ति का प्रदर्शन किया है और और मनुष्य को वर्तमान खराब स्थिति के लिए एक स्पष्ट अपराधी के रूप में साबित किया है।

कोविड -19 के खिलाफ लड़ाई जीतने के बाद, एक व्यापक अध्ययन देश में  और विश्व स्तर पर व्यापक रूप से आयोजित किया जाना चाहिए जिसमे लॉकडाउन के कारण हुए आर्थिक नुकसान  के साथ – साथ इस बात का भी अध्ययन हो कि पृथ्वी और पर्यावरण कि गुणवत्ता में कितना सुधार आया  हैं, प्रदूषण के स्तर में गिरावट, नदियों और अन्य जल निकायों के ऑक्सीजन स्तर में वृद्धि, ग्रीन हाउस गैसों में कमी का  मूल्यांकन किया जाना चाहिए। क्योंकि मनुष्य का अस्तित्व धरती माता के अस्तित्व पर निर्भर है।

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