कहानी -सैलाब, अनिता रश्मि की कहानी

नैना ने दीवार घड़ी की ओर देखा।
“अरे! छ: पचास। आज इतनी देर से नींद खुली?”
झटपट रसोई जाकर साॅसपेन चढ़ाया। जाॅर्ज और फलोरिडा सात दिन से शिमला में हैं। उन्होंने कहा है,
“डेली सिक्स फाइव में हमको ब्लैक टी डेना।”
उसने ट्रे पर चार डाइजेस्टिव बिस्किट रखे, दो कपों में चाय ढाली। ट्रे उठाकर चल दी कमरा नं. 5 की ओर। अभी दो कमरे खाली थे, चार भरे।
“गुड मॉर्निंग सर!… गुड मॉर्निंग मैडम!… साॅरी!”
“गुड मॉर्निंग! नो प्राॅब्लम।”
उन्होंने मुस्कुराकर कप-प्लेटें उठा लीं।
“टी का इंज्वॉय अंडर दी मजनूं ट्री।”
मजनूं पेड़ के नीचे घास पर बैठकर वे चोटियों से ऊपर बढ़ते, आकाश में बहुरुपिए बनते बादलों में खो गए।
पीठ पर बैग थामे अमेरिका, इंग्लैण्ड, ऑस्ट्रेलिया से पर्यटक आते हैं। कभी यहीं से कश्मीर, कभी कश्मीर की सैर के बाद यहां पहुंचते। नैना के हाथों का खाना और देखभाल उन्हें भाता।
नैना शिमला से दूर एक छोटे से गांव में किशोरपन में ब्याह कर आई थी। घर बड़ा था, छत कबेलू पत्थर के सलेटी टाइल्स की थी।
पति कृष्ण जामवाल ने पूछा था,
“पसंद आया घर?”
“हांजी! मायके की सुबास है, वहां भी ऐसा ही।”
तेरा नाम किसने…?”
“…देवी नैना के नाम पर मां ने रखा था।”
लंबी नैना की दुबली-पतली काया देखकर सबलोग कहते,
“तेज हवा में उड़ जाएगी।”
नैना पतली टांगें जमीन पर रोपकर तन जाती,
“इतने सुकुमार नहीं है हम।”
अपने श्रम से सिद्ध भी कर दिया।
सास बहुत कर्मठ, उसे साथ लकड़ियां बीनने ले जाती थीं। दोनों तेज हथियार से लकड़ियां काटतीं थीं, सर पर ढोकर ऊंचे-नीचे पहाड़ी रास्ते से आती थीं। नैना की कमसिन सुतवां नाक, कपोल लाल हो जाते। फिर उसने बकरियों, भेड़ों, खेत की जिम्मेदारी भी ओढ़ ली।
भारी किलटा पीठ पर लादकर दोनों जब लौटतीं, सास की झुकी कमर से नैना ही किलटा उतारती थी।
वे लकड़ी चूल्हे पर खाना पकाती थीं। धुएं से घर भर जाता। जब आग लहकती धुआं छत, खिड़की से भाग निकलता।
दोनों त्यौहारों में पारंपरिक गहने पहनकर महानाटी नृत्य करतीं, सम्मानित होतीं।
गांव के रास्ते बार-बार बदले। तब हर गांव के लिए कच्ची सड़कें भी नहीं थीं। जंगली घनेपन, ऊबड़-खाबड़ पथरीले रास्ते से रिज जाना होता था।
पंद्रह वर्ष पहले कृष्ण जामवाल ने गांव के घर, सेब बगानादि बेचकर शिमला में बसने की ठान ली थी। उन्हें गाँव की संकरी गलियां, मकानों की दीवारें, बर्फ से बचने के लिए बनीं तिरछी त्रिभुजाकार छतें अखरतीं। मिट्टी की सुगंध भी। शुरू से सभी फैसले परिवार मिलकर लेता था। इस फैसले से पिता नाराज,
“मिट्टी से तुम्हारा सम्बन्ध छूटने लगा है।”
“बिजनेस प्रभावित हो रहा है इसीलिए जा रहा हूं। आप दोनों भी चलो।”
“मिट्टी का सोंधापन हम नहीं छोड़ेंगे। यहीं रहेंगे कृष्ण!”
मां बोली थी,
“परिश्रम से भाग रहे हो? वहां मेहनत नहीं करनी पड़ेगी?”
नैना की मनुहार भी सास ने नहीं मानी,
“किसी की जरूरत नहीं। जाओ तुमलोग।…पहले माटी-सीमेंटे की नहीं, रिश्ते की मजबूत दीवारें थीं।”
कृष्ण खिन्न होकर मां के पास से उठ गए थे।
कृष्ण सेब-आडू बगान, खेत के हिस्से बेचकर सपरिवार शिमला में जम गए थे।
“अब माल रोड उतनी दूर नहीं लगता। ऊपर से पक्की सड़क।”
लिफ्ट से निकलकर रिज में अपनी दुकान की ओर बढ़ते हुए नैना कृष्ण से कहती। वह सूट, पुलोवर, मफलर, कैप्री, शाॅल, किन्नौरी टोपी लेकर माल रोड का चक्कर काटती। कभी गेयटी थियेटर, कभी चर्च के सामने बार्गेनिंग करनेवालों से, कभी यमराज, हनुमान बने बहुरुपिए में व्यस्त पर्यटकों से उलझती,
“मेमसाब! यह सूट आप पर खूब फबेगा।”
“यह हनुमान ड्रेस आपके बच्चे के लिए…।”
धीरे-धीरे वहां भटकने की बजाय दुकान पर बैठने लगी।
गैस का कनेक्शन लिया तो गोल चिबुक, चौड़े माथेवाली नैना का उत्साह दूना।
“अब न धुआं, न कालिख। न ही नाक-आंख लाल!”
बड़ा बेटा राम जामवाल भी खुश,
“पापा! कहीं जमीन देखो।”
“देख रहा हूं। जल्दी हमारा अपना घर होगा।”
“हां! कितने दिन किराए के मकान में रहेंगे।”
गांव में ससुर, सास संग छोटा देवर। समय-कुसमय या पर्व-त्योहारों पर वे लोग सपरिवार गांव जाते।
सास के गुजरते ही ससुर ने साधु बन सुदूर ऊंची चोटी पर मंदिर में रहने की ठानी।
“मुझे मोह माया से छुट्टी दो। तुमलोग संभालो।”
बारंबार मनाने पर भी नहीं लौटे। लोगबाग ने बहुतेरी कोशिशें कीं,
“अरे ऽ! ये क्या महाऽराऽज! बच्चों संग रहो।”
वे नहीं मानें।
“नहीं महाराज! अब बस भगवान भजन!”
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सीजन में पर्यटकों की भीड़ देखकर किराए पर फूल बूट, जैकेट, फरदार कोट देनेवालों सहित सारे दुकानदारों की बांछें खिल उठीं। उत्साह से भर गई नैना भी,
“इस बार कमाई अच्छी है जी।”
“अभी और होगी। दूर-दूर से टूरिस्ट आए हैं।”
पर्यटक तस्वीरें खीच-खींचकर फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्स ऐप पर पोस्ट करते रहते। पहाड़ों पर जड़ते जा रहे रंग-बिरंगे घर उन्हें नगीने लगते।
कृष्ण कहते,
“कठोर जीवन देखने की शक्ति इनकी आंखों में नहीं है।”
“हां पापा! ये इमारतों की खूबसूरती में खोए हैं। बढ़ती चौड़ी सड़कों पर ड्राइव कर इतराते हैं। इन्हें पता कहां…?”
जब भी पर्यटक मोल-भाव करते, कृष्ण समझाते,
“प्राइस सामान का लगाया। मेहनत का लगाया ही नहीं सर जी!”
“मैडम! लागत तो निकले न? मेहनत की छोड़ दी है।”
“पांच सौ का पोंचो चार सौ में लो। किसी को बताना नहीं।”
“बर्फबारी में जीना बहुत कठिन है जी! सीजन में ग्राहक का ही आसरा।”
“याक की खाल का ब्लैंकेट है। गर्मी में इधर से ओढ़ने पर ठंडा, सर्दी में दूसरी तरफ से ओढ़ने पर गरम।”
“मत लेना। देखने के पइसे थोड़े न लगने हैं।”
“पश्मीना आप जैसों के लिए क्या महंगा।”
“किन्नौर की चटख टोपियां भी लो न।”
अनेक पर्यटक खरीदकर पूरे समय पहने रहते। कृष्ण जामवाल भी किन्नौरी टोपीधारी। व्यापारिक बुद्धि के धनी कृष्ण ने व्यापार को और बढ़ा लिया था। पिता की बातें गांठ बांधे रखते।
राम व्यास नदी में टूरिस्टों को रिवर राफ्टिंग कराता।प्रशिक्षित तैराक नाव लेकर खड़े रहते। वे पर्यटकों को लाइफ जैकेट, कैप पहनाकर नाव में बिठाते। फिर विपाशा के हरिताभ धार में उतर जाते। छिपी चट्टानों से बचते हुए तेज गति से नाव आगे बढ़ती। पर्यटक खिलखिलाते हुए राफ्टिंग का मजा लेते। बीच चट्टानों से टकराते, उछलते वोट से झुककर हिम शीतल जल उछालकर जिद मचा देते,
“न…अभी नहीं लौटना।”
“प्लीऽज! थोड़ा और।”
नाव दूर तट पर लगती। राम उनसे अब पैसे वसूलता। उसने तीन नावें खरीद ली थीं।
छोटा लखन ड्राइवर है। इन दिनों लखन का इनोवा बुक रहता है। लखन यात्रियों को घोड़े पर ऊपर कुफ्री ले जाता था। फिर घोड़ा बेचकर टूरिस्ट एजेंसी ज्वाइन कर ली।
रात ढले तीनों एक साथ भोजन करते। तब दिनभर के अनुभव बांटते। कृष्ण, राम लुग्गड़ पीते।
बाकी दिनों वे सब सेब-प्लम बगान में काम करते। खेत से धान, आलू, मक्के, भींडी मिल जाती। दिनभर खेत-खलिहान समेटते सांझ हो जाती। नैना किलटा में घास, अनाज, सब्जी, फल वगैरह लेकर लौटती।
पूरा हिमाचल पीठ पर बांस से बने भारी किलटा संग ऊंची-नीची पहाड़ी रास्तों पर आवाजाही में व्यस्त। किलटा जैसे जीवन और संस्कृति का हिस्सा।
परतदार खेतों में जब फसलें लहलहाने लगतीं, वे संतुष्ट।
“चलो, इस बार फसल अच्छी है।”
प्रायः पर्यटक देर रात ही आते। रात-विरात आनेवाले की फरमाइश पर नैना पूरा खाना बनाती। सुबह नाश्ता, रात का खाना परोसने में राम की अहम् भूमिका रहती। दिन में जरूरत न पड़ती।
सोने से पूर्व नैना तश्तरियों, कटोरियों, गिलासों को धो-पोंछकर सजाती। राम मदद करता।
“पापा! होम स्टे के लिए कमरे कम हैं। आगे की सोचो।”
“उस जमीन का क्या हुआ?”
“उसमें होटल बनाना ठीक नहीं।”
जमीन बहुत ऊंची चोटी पर थी। गंझिन इलाके में पांच बिल्डिंगों के ऊपर बुरांश के पेड़ों से घिरी। चारों ओर चारमंजिला होटल और दोमंजिला सीमेंटेड मकान थे…रास्ते संकरे। कबेलू की तिरछी छतोंवाले घर मृतप्राय।
“क्यों?”
“वैसी संकरी जगह पर चार तले का होटल बनाना उचित नहीं।”
वह पापा-मां को समझाता रहा,
“सबने देवदार और दूसरे पेड़ काट डाले हैं। मैंने व्यास के पास जमीन देखी है।”
“क्या खासियत है?”
“खुली जगह है। नदी के पास होने से टूरिस्ट ज्यादा आएंगे।”
“जैसा उचित लगे, करो। पर ज्यादा लोन का चक्कर सही नहीं।”
“ठीक। पहले घर बन जाए। बाद में होटल की सोचेंगे।”
राम व्यास के पास घर बनवाने लगा था।
एक रात बतकही के समय राम ने बताया,
“कई होटल सर उठा रहे हैं। अगल-बगल पिल्लर ही पिल्लर।”
सालभर में ही दुमंजिले घर के बाहर पीतल की पट्टिका लग गई “नैना होम”। आजू-बाजू में ऊंचे, भव्य होटल सर तानकर खड़े हो गए।
टूरिस्टों की अंधाधुंध भीड़ ने होटलों की जाल बिछा दी। कोने-अंतरों में भी पहाड़, देवदार, आडू काट-काटकर कई मंजिला होटल आबाद हो गए। छोटे ढाबे से शुरू भोजनालय बड़े होटलों का जामा पहनकर ऑनलाइन बुक होते। गर्मियों के लिए होटलों की बुकिंग सर्दियों से पहले ही होतीं। बेचारे पहाड़ तड़पते। दुर्दशा देखकर राम को दादा याद आते,
“शिमला केवल पच्चीस हजार लोगों के लिए बसाया गया था।”
“हालत चिंताजनक है। शिमला अधिक भार नहीं ढो पाएगा।”
चिंतित राम सभी से कहता,
“शिमला, मनाली, मंडी भी केदारनाथ न बन जाए। संभलो म्हाराजऽ!”
एकाएक चुप!
‘कहीं शाप न समझ लें। सीजन में तेजी से बढ़ी कमाई में मस्त हैं। बर्फीले दिन की जुगाड़ में व्यस्त।’
राम जामवाल ने एक कविता लिखी। हमेशा लिखता है। छपने नहीं भेजता। बस, डायरी के पन्नों पर उग आतीं जब-तब कविताएं। आज भी उगीं,
पहाड़ ने हौले से ली सिसकी मिल गईं उसमें और कई सिसकियां!
नैना से कहता, “प्रायः हर घर में होम स्टे का चलन बढ़ता जा रहा है।”
“क्या करे कोई। टूरिस्ट हमारी जान हैं बेटा!”
कुछ दिनों से नैना की बेटी सोना भी साथ है। दामाद लाम पर जाते समय पहुंचा गया।
“अकेली क्या करेगी। मैं चिंता में रहूंगा।”
“ठीक है न। घबराना नहीं, मैं कंस मामा नहीं बनूंगा।”
राम ने हंसकर सोना का हाथ थाम लिया था।
सोना मनाली के हिडिंबा मंदिर के पास रहती थी। राकक्षी हिडिंबा की निवास स्थली में पैगोडा शैली के गुफा मंदिर के चारों ओर कई सौ साला देवदार खड़े थे। पांडु पुत्र, राक्षसी पत्नी हिडिंबा ने यहीं जंगलों में रमण किया था।
ऊंचे-ऊंचे देवदार वृक्षों के नीचे चट्टानों के पास खरगोश लेकर उसकी सास टूरिस्टों के पीछे पड़ जाती,
“इसे लेकर फोटो खींचना जी!”
“जितना चाहो, खेलो। ज्यादा पैसे थोड़े न लगेंगे।”
सास पर्यटकों के कंधे या सर पर खरगोश रख देती।
ससुर याक की सवारी कराकर पैसे कमाते। अनेक काम कर उन्होंने बेटे को पढ़ाया था।
इंटर करते ही बेटे की शादी कर दी थी। नैना चिंतित।
“दीदी, जीजा खुश हैं। तुम चिंता मत करो मां! जीजा को नौकरी जरूर लगेगी।”
दोनों भाई समझाते थे। दामाद की सेना में नौकरी लगते ही नैना सहित परिवार निश्चिंत।
राम शांत प्रकृति का लेकिन पड़ोसी वृंद नेगी से झगड़े चलते रहते। आज भी हुआ तो नैना ने टोका,
“दूसरे के कारण तू अपना सुभाव क्यों बिगाड़ता है?”
“वह मुझे देखकर थूकता है। चुप रहूं?”
“ओह! फिर भी…।”
“और जो हमारी नाली में प्लास्टिक डालता है।”
“मैं साफ कर देती हूं न? उसने तुझे मारने की धमकी दी है। डर लगता है।”
नैना ने किचन साफ करते हुए बातों का रुख पलट दिया,
“बहू आ जाए, मेरी दिन-रात की खिच-खिच कम हो।”
“इंगेजमेंट हो गई। जब चाहे, ब्याह करा दे।”
उसके सामने माथे पर चांदी का बड़ा चक, गले में चन्द्रहार, कलाई में टोके, पांव में पैरी पहने हुए, पट्टू और थिम्पूधारी खूबसूरत पत्नी सुहानी डोलने लगी। आजकल रंग-बिरंगे नकली गहनों की धज है तो नकली गहनों से सजी भी।
“तेरे पापा से बात करती हूं। लखन भी आ जाए।”
रसोई से फुरसत पाकर राम वीडियो काॅल में व्यस्त। शर्माती भावी दुल्हन का चेहरा देखने, बतकही करने के बाद ही उसको नींद आती।
सुहानी के लाल पड़ते गालों, अटक-अटककर बोलने के अंदाज, शर्म से झुकीं आंखों का जादू बहुत गहरा था। वह कजरारी आंखों को उसकी जिद पर उठाकर हौले से नमस्ते करती, राम खिल उठता। रात भर सपने में रहता।
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पांच महीने की गर्भवती सोना के लिए वह आज मिठाई लेकर आया। सोना भी मंदिर जाने के लिए माथे पर चिरी (मंगटीका की तरह गहना), चन्द्रहार पहने बैठी थी।
“दीदी! चलो, प्रसाद चढ़ाकर आते हैं।”
पैदल चल पड़े वे। राह उबड़-खाबड़ थी। कहीं नैना सहारा देती, कहीं राम।
लौटते ही देखा, घर के पास पहाड़ पर थोड़ा भूस्खलन हुआ है। पाए में दरार की पतली लकीर देखकर सोना घबरा उठी।
“हिडिंबा माई! रच्छा करो।”
पास के होटलों में भी दरारें पड़ गईं। दरारविहीन घर भी भयभीत।
“इस बार सावन कहर बनकर टूटा है। कहीं सूखे का कहर, कहीं बाढ़ का। पहाड़ों पर आफत आ गई है।”
नैना ने राम को देखा।
“हां मां! जोशी मठ तो ट्रेलर था।”
आशंकित नैना,
“इसीलिए कहते थे, व्यास के पास घर न बनाओ। घर को कितने प्रेम से हमने स्टे होम में बदला था।”
“हमें भी सुरक्षित स्थान पर जाना चाहिए पापा!” रात सोना ने बात उठाई।
“हां पापा! शिमला, मंडी और पूरे हिमाचल प्रदेश की बर्बादी हो रही है। नदियों का पाणी सब लील रहा है।”
नैना ने पूछा,
“बिजली-पाणी, दूध सब बंद। क्या करना है जी?”
“मां ठीक कह रही है। क्या करना है पापा?”
“कल भर देख लो। आज सैलाब नहीं आएगा राम!”
“आ गया तो…?”
“…सब छोड़कर जाना आसान है?”
कृष्ण, नैना अगले दिन दुकान गए। नैना दोपहर को लौटी। आते ही कहा,
“हवा हड्डियां छेद डाल रही है।”
राम भी आ चुका था। उफनती व्यास में नाव नहीं उतारी जा सकती थी।
“मां, फुफकारती नदियां अपना रास्ता बदल रही हैं।”
उसकी आवाज में चिंता,
“शाख-शाख बिफर-बिखर रहा। काले बादल पहाड़ों पर छाकर दिल दहला रहे हैं।”
“हिमालय गुहार लगा रहा है।”
तीनों के मुंह से प्रार्थना फूट पड़ी।
शाम को ही कृष्ण भी आ गए। रात तक लखन लौटा तो सामान बांधने में मदद करने लगा।
आधी रात को काले गरजते बादलों ने अपना विकराल रूप दिखला दिया। पहले चांद को ढंका। फिर फट पड़े।धारसार बारिश…। व्यास नागिन बन गई।
देवदार, प्लम, आडू, बुरांश घरों पर गिर पड़े। सब धराशायी। सैलाब रिहायशी इलाकों, खेतों, होटलों को बहा ले गया।
राम बहते हुए मैदान के एक किनारे जा लगा। थोड़ा स्थिर होते ही उसने वृंद को भी बहते देखा, झट हाथ बढ़ा दिया।
“दो अपना हाथ म्हराज!…ओ महराज!”
सलेटी देवदार की डाल से लिपटे वृंद को बाहर खींचते वक्त भूल गया दुश्मनी।
सोना, लखन सामने से गायब हो गए। पापा की झलक भी नहीं मिली। शव के दबे होने की खबर मिलती, राम पागलों की तरह भागता, ‘शायद पापा…शायद दीदी…शायद लखन…शायद जार्ज-फ्लोरिडा।’
मलबे से निकाली गई लाशों में पापा थे… क्षत-विक्षत! दीदी-लखन थे, मां नहीं थी। उसने अपनी रुलाई गटक ली। बावला हो गया। कई देह उलट दी। किसी के हाथ-पांव मुड़ें, किसी की गर्दन उलटी, किसी की छाती मलबे में धंसी। किसी के पैरों पर भारी देवदार…चिथड़े।
“किसी को ऐसी मौत न देना नैना देवी!”
वह नैना को ढूंढता रहा। नीला पट्टू देखते ही दौड़ पड़ा। मां ही थी। शौक से रोपे गए धराशायी मजनूं पेड़ से लिपटी हुई।
दोनों को राहत शिविर में टिकना पड़ा। सबके चेहरे सूखे, हताश, दर्द से भरे। सब कर्मठ! मेहनत की रोटी खानेवाले। थोड़ा आश्वस्त होते कि तबाहीभरी खबरें विचलन बढ़ा देतीं। बड़ा प्रश्नचिन्ह मुंह बाए खड़ा,
“जड़ों ने मिट्टी, मिट्टी ने जड़ों को छोड़ दिया।…हिमाचल बचेगा?”
“सब बिखरकर पाणी के साथ हो लिये।…अब?”
“विकास की रपटीली जमीन पर कई इलाके तबाह…अब?”
‘अब’ फैलता गया। बहुत बड़ा हो गया।
राम बताता,
“सलाहें मानकर सुरक्षित स्थानों पर जानेवाले बच गए सर जी! बस, माल की हानि…”
“…हम बहुत हाथ-पांव मारे। नहीं बचा पाए। जान-माल दोनों से गए।”
“न न जी! बस, मां…और कोई नहीं।”
“गांव का भी नामोनिशान नहीं बचा। हाथ से फिसलती लकीरें…पाणी की लकीरों पे सर पीटते लोग बचे वहां।”
लोग आकर हिम्मत बंधाते। वह चीखता,
“असली कारण हैं, बेतरतीब कंस्ट्रक्शन्स…पेड़ों की बलि। देवभूमि को छलनी कर दिया लालच ने।”
“हम नदियों की भी कीमत नहीं पहचानते। व्यास, गंगा, यमुना सब कराहती हैं। दांव लगते ही गुस्से से उफन पड़ती हैं।”
“मैं कहता रहा। किसी के कान पर जूं न रेंगीं म्हराज!”
“सीजन के बल पर ही जिंदगी चलती है न महाराज ऽ!”
“जिंदगी गई भी तो।”
बीस दिन कैंप में बीत गए। नैना की आँखें भर-भर आतीं। हर वक्त जैसे सैलाब प्रतिछाया। उसके चेहरे की घनीभूत वैराग्य छाया राम को डराती।
तकलीफदेह था हाथ फैलाना। थाल लेकर लाइन में लगता, मन में उठती मरोड़। भोजन के लिए हाथ पसारते ही विचलित।
राम की आंखों में वह मंजर…उसने फ्लोरिडा, जार्ज को एक-एक हाथ से थामना चाहा था। उसके पांव चट्टान में फंसे थे। खाली हाथों को फैलाया था, खाली ही रह गए थे। उसी दिन नैना ने कहा था,
“कल जार्ज, फलोरिडा वापस जाएंगे। वे चर्च गए हैं। उन्हें लि़गचाय शाॅल दे देना। पहाड़ी स्पीति का लिंगचाय उन्हें पसंद है।…कहवा गिफ्ट करना।”
नैना को जार्ज और फ्लोरिडा के बारे में बताने की हिम्मत नहीं हुई। तीनों की बाॅडिंग राम ने देखी है।
सोना की आखिरी अरदास याद आई,
“रच्छा करो हिडिंबा मां!…माता रानी! हे धौला देवी!”
आँखो पर बाहाँ की ओट डालकर दरी पर लेटते ही कोलाज – धारसार बारिश…सलेटी विपाशा का तांडव…बहते लोग-मवेशी…बिखरी ईंटें, छतों-दीवारों के टुकड़े, गंदे कपड़े, पेड़।
एक कविता ने फिर जन्म लिया,
जिंदगी नहीं मिलती
यूं ही
पाने के लिए
खोना पड़ता है,
जिंदगी चली जाती
यूं ही
खोने के लिए
कुछ पाना नहीं पड़ता
…
नैना भी बेचैनी से करवटें बदल रही थी। अचानक बोली,
“बाढ़ सबके भीतर भी है।”
“यह परकिरति का बदला है।”
उसकी आँखों में भी विपाशा का रौद्र रूप! राम नैना के पैरों से जा लगा।
“परलय है, परलय! सब बर्बाद कर देगा।”
“नहीं मां! सब संतुलित करने आया है।”
“शिव का तांडव है बेटा! इस बार वे दक्ष पे नहीं, हमलोगों पर गुस्सा निकाल रहे हैं। उनके कंधे पर सती नहीं, पहाड़ हैं।”
राम की कल्पना में सुहानी के सुकोमल गात, आरक्त कपोल सलेटी कीचड़, माटी, दलदल में धंसे नजर आने लगे।
“सुहानी? फोन नहीं उठाती है। कहीं…?”
एक दिन मोबाइल का रिंगटोन बजा। राम ने सांस लिये बिन पूछा,
“कैसी है तू?…घरवाले?…खेत?…मवेशी?”
“मैं ठीक हूं।”
एक सिसकी,
“घर के सब चंगे, सब बच गए। बाकी सब खत्म।”
उतावली आवाज,
“और आप सब कैसे?”
मां के इलावा कुछ न बचा जी! दीदी की आज ही डिलेवरी डेट थी।”
“ओह!”
“एक बात पूछनी थी।”
“हांजी! पूछो न।” सुहानी की आवाज का कंपन स्पष्ट।
“मेरा सब लुट चुका है।…क्या ऐसे में भी तू…?”
“…हां!…हां! एकदम। तुम्हारे संघर्ष में मैं भी साथ हूं।”
उसे लगा, मां को बहू की सलामती और रजामंदी की खबर खुशी देगी।
जीवन धीरे-धीरे पटरी पर। नैना भी प्रकृतस्थ हो चली। राम ने मां का हाथ पकड़ा।
“चलो मां! कहीं दूर चलें।”
“कहां?”
“जहां पहाड़ों से उठते विध्वंस की धूल न हों।”
नैना के चेहरे की सलवटें गहरा गईं।
“नहीं! यहीं रहेंगे। यहां तुम्हारे पापा, लखन, सोना हैं। और… और नाती भी…।”
नैना ने हौले से हाथ छुड़ाया। पहाड़-सी सिसकी उभरी।
“हम अपनी देवभूमि छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। भागना समाधान नहीं।”
फिनिक्स पक्षी फड़फड़ाया।
एक महीने बाद नैना, राम अपने बगान में पहुंचे। वृंद भी साथ। हतप्रभ खड़े रह गए तीनों।
“इतनी बर्बादी?…हाय!”
“संभलने में न जाने कितने दिन लगेंगे…।”
“राम, पहले वृंद का बाग संभालना है। चलो।”
वृंद का बाग ठीक उसकी ऊपरवाली चोटी पर था। वहां भी तबाही। दोपहर तक सफाई के बाद तीनों गड्ढे खोदने लगे। सेब, प्लम, आडू, केले के ताजे पौधे आज ही सरकारी कर्मचारी ने बांटे थे।
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युद्ध, भुखमरी, बीमारी, वैमनस्य से जूझ रही दुनिया में अत्यधिक खूबसूरत देवभूमि के वाशिंदे नैना व राम का मन नए संघर्ष की तैयारी में जुट गया। राम ने एक आवेदन पत्र लिखा,
जीवन से बड़ा कुछ नहीं। जीवन बचाने के लिए पहाड़ों को बचाएं। पहाड़ों का सीना छलनी होने से बचाएं।
सबसे जरूरी बात, एक बार में सीमित पर्यटकों का रजिस्ट्रेशन हो। अंधाधुंध भीड़ से बचाएं ‘पूरे हिमालय’ को।
सबसे हस्ताक्षर करवाकर संबंधित विभाग को पोस्ट कर दिया।
आंसुओं के गोल-फैले धब्बों की फरियाद भी वहां जा पहुंची।
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अनिता रश्मि
राँची, झारखण्ड – 834002
