कविता
- मेरी कलम से
कविता – मंजिल
जब “मंजिल” से हुई, गुफ्तगू,हर “मोड़” पर “कश्मकश” थी,कभी काँटे लदे,कभी कंकड़ बिछे,“मजबूर” चलने को जिंदगी थी। तूफ़ां तो,कभी हवाओं…
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कविता – शब्दों से शिकायत
शब्द तुम बोलते वक्त कहाँ चले जाते हो?समय पर मेरे काम क्यों नहीं आते हो?मैं निःशब्द – सी रिक्त हो…
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चाहत…..सौजन्य: श्री डी. के.सक्सेना(दीप-दर्शन)
हम भी क्या मनन कर बैठे! होकर खाना बदोश ,जहाँ अपना समझ बैठे।
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मेरी कलम से; रूह – ए – कायनात
सलवटे मलबूस (बिस्तर) की, आँखों में बदन की भूख, क्या सिर्फ टुकड़ा-ए-गोस्त ही थी मैं? शक सुवहा, वासना से मिले…
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