नीव के पत्थर

नीव के पथर – ऑटो-रिक्शा

नीव के पथर में आपका स्वागत है। यह कैफे सोशल मैगज़ीन का एक खास हिस्सा है जहाँ हम रोज़मर्रा के हीरो की अनकही कहानियाँ सुनाते हैं। यहाँ हम उन लोगों का सम्मान करते हैं जो बिना शोर-शराबे के हमारे जीवन को आगे बढ़ाते हैं।

ऑटो-रिक्शा सिर्फ मुंबई का नहीं, बल्कि देश के सभी बड़े शहरों का एक अहम हिस्सा हैं। ये वाहन, चाहे दिल्ली, कोलकाता, बेंगलुरु या हैदराबाद में हों, हर जगह लोगों को एक दूसरे से जोड़ते हैं। इनमें से कई ऑटो ड्राइवर अपनी मेहनत, ईमानदारी और सेवा भाव से अनदेखे हीरो बन जाते हैं। इनके प्रयास से शहर की सड़कों पर जीवन की गति बनी रहती है और यह हमें आशा देता है कि समाज में सकारात्मक बदलाव संभव है।

हम मानते हैं कि अच्छे और कमजोर दोनों तरह के ड्राइवर मौजूद हैं, पर पहली नजर में सभी को एक जैसा नहीं समझा जा सकता। अधिकांश ऑटो ड्राइवर अपने काम के प्रति निष्ठावान होते हैं और हर रोज हजारों लोगों का सहारा बनते हैं। इन अनसुने हीरो के प्रयासों को देखकर हमें गर्व होता है और इनके प्रति हमारी कृतज्ञता बनी रहती है। आइए, जानते है ऐसे ही  एक ऑटो / रिक्शा ड्राइवर की अनसुनी दास्तान ।


नीव के पथर: मुननवार काज़ी – मुंबई में एक ऑटो ड्राइवर की कहानी

मैं मुननवार काज़ी हूँ। मेरा जीवन मुंबई की सड़कों पर बीता है, जहाँ ऑटो-रिक्शा सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि जीवन का सहारा है। कई सालों तक मैंने मुंबई की भीड़ में अपने ऑटो से सवारी कराई, और बहुत सी कहानियाँ देखीं।

मेरा जन्म कोल्हापुर जिले के अनफ ख़ुर्द नामक छोटे गाँव में हुआ। हमारे पास ज्यादा कुछ नहीं था, इसलिए जब मैं छोटा था, तो मैं अंधेरी, मुंबई आया। यहाँ का शहर बड़ा और मुश्किल था। मैं एक छोटे से चॉल में रहता था और पढ़ाई भी अधूरी रह गई, क्योंकि रोज़ की जद्दोजहद ने मुझे रोक दिया।

मैं स्वभाव से शर्मीला था और हमेशा चुपचाप अपने काम में लगा रहता था। मुझे लगा कि ईमानदारी और मेहनत ही मेरे सच्चे साथी हैं।

ऑटो-रिक्शा ने मुझे जीने का मकसद दिया। मैं कभी भी किसी सवारी को मना नहीं करता था। चाहे दूरी छोटी हो या लंबी, चाहे रात हो या बारिश, मैं हमेशा ‘हाँ’ कहता था। मुझे पता है कि जब कोई फंस जाता है, तो कितना दुख होता है, इसलिए मैंने ठाना कि किसी को ऐसा महसूस नहीं होने दूँगा।

सालों में मैंने अपनी ऑटो में हर तरह के लोग देखे—मजदूर, माँ, विद्यार्थी, ऑफिस जाने वाले, गर्भवती महिलाएं, आपातकालीन अस्पताल जाने वाले मरीज़ और कभी-कभी सेलिब्रिटी भी। उन पलों में मैं सिर्फ ड्राइवर नहीं रहा, बल्कि उनकी यात्रा का हिस्सा बन गया।

मुंबई में ऑटो का महत्व

मुंबई में समय की बहुत कद्र होती है। ऑटो-रिक्शा कई बार लोगों की जान बचा लेते हैं। मुझे याद है कि कैसे अभिनेता सैफ अली खान को ऑटो ड्राइवर ने अस्पताल पहुँचाया था। मैंने भी कई बार आपात स्थिति में लोगों को जल्दी से अस्पताल पहुँचाया है।

यहाँ अमीर-गरीब सब ऑटो पर निर्भर करते हैं। चाहे कोई बिजनेसमैन हो, फिल्म स्टार हो या मजदूर—सबको इस साधन से आराम मिलता है। मुंबई में ऑटो-रिक्शा एक ऐसा साधन है जो हर किसी की सेवा करता है।

ऑटो ड्राइवर की चुनौतियाँ

हमारे काम की तारीफ तो होती है, पर कई बार आलोचना भी सुननी पड़ती है। कुछ ड्राइवर छोटी दूरी या कुछ जगहों पर सवारी करने से मना कर देते हैं। मुझे समझ आता है कि कुछ ड्राइवर ईंधन की चिंता में ऐसे करते हैं, पर मेरा मानना है कि हमें हर सवारी करनी चाहिए।

कभी-कभी हमें ऐसे यात्रियों से भी सामना करना पड़ता है जो पैसे नहीं देते या गुस्सा हो जाते हैं। कभी-कभी मामूली गलती पर हमें थप्पड़ भी मिल जाते हैं। यह काम कठिन है, पर मुंबई में लोगों का प्यार और सहारा भी मिलता है।

संघर्ष और कृतज्ञता

मेरी ईमानदारी और मेहनत से मैंने अपने परिवार के लिए एक छोटा घर बना लिया। मेरा सबसे बड़ा गर्व यह है कि मैंने अपना सपना पूरा किया और दो बार उमरा भी किया। मक्का में खड़ा होना उन कठिन दिनों की याद दिलाता है, और मैं इसके लिए हमेशा आभारी रहूँगा।

अब, 65+ की उम्र में, मैं ऑटो नहीं चलाता, पर मेरा दिल अभी भी मुंबई की सड़कों से जुड़ा है। मैं उन दिनों को याद करता हूँ जब मैं ऑटो में लोगों की सवारी कराता था, और उनकी कहानियाँ सुनता था।

साथियों के लिए सलाह

अगर मैं किसी भी ऑटो ड्राइवर को एक सलाह दे सकूँ, तो वह है: हर मोड़ लेने से पहले साइड मिरर जरूर देखें। जल्दी-जल्दी ओवरटेक न करें। इन छोटी-सी बातों से हम कई हादसों से बच सकते हैं और सबकी सुरक्षा कर सकते हैं।

मुंबई के ऑटो ड्राइवरों को सलाम

मैं किसी की तारीफ का इच्छुक नहीं हूँ, और न ही मेरी तस्वीरें खिंचवाना चाहता हूँ। मुझे खुशी तब होती है जब मैं जानता हूँ कि मैंने मुंबई को चलाने में अपना छोटा सा योगदान दिया। हम ऑटो ड्राइवर सुबह से उठते हैं, बारिश में भी काम करते हैं ताकि कोई भी सवारी बिना पहुँचे न रहे।

तो अगली बार जब आप ऑटो पकड़ें, याद रखिए कि उस हैंडल के पीछे कोई ऐसा इंसान है जो शहर की सुरक्षा में जुटा है। मेरी कहानी तो खत्म हो गई है, पर हजारों लोग हर दिन यह काम जारी रखते हैं।

मुंबई के ऑटो ड्राइवरों को मेरा सलाम—ये अनदेखे हीरो हैं जो हमारे शहर को जीवित रखते हैं।


मुननवार काज़ी से कुछ सवाल-जवाब

प्रश्न: आप हमेशा एक ईमानदार और मेहनती ड्राइवर रहे हैं। आपने कभी सवारी मना नहीं की। आपको यह अच्छाई, जो बहुत कम ऑटो ड्राइवरों में होती है, कहाँ से मिली?
उत्तर: मैंने हमेशा सोचा कि सड़क पर कोई भी अकेला महसूस न करे। कठिन समय ने मुझे सिखाया कि हर मौके की कद्र करनी चाहिए। मेरे संघर्षों ने मुझे दूसरों के प्रति दया और सेवा का मतलब समझाया। चाहे दूरी छोटी हो या लंबी, मेरा काम था मदद करना।

प्रश्न: कई लोग कहते हैं कि कुछ ड्राइवर छोटी दूरी की सवारी नहीं करते। आपका क्या कहना है?
उत्तर: मैं समझता हूँ कि कुछ ड्राइवर ईंधन के खर्च या पुराने अनुभव की वजह से सवारी नहीं लेते। पर मैं हमेशा कहता हूँ कि अगर हम ‘ना’ कहेंगे, तो लोग हम पर भरोसा खो देंगे। हर सवारी जरूरी है।

प्रश्न: कभी-कभी ऑटो ड्राइवरों को खतरनाक यात्रियों का सामना करना पड़ता है। क्या ऐसा कभी हुआ है?
उत्तर: हाँ, कई बार हुआ है। कुछ यात्री पैसे देने से मना कर देते हैं या गुस्से में आ जाते हैं। एक बार कुछ नौजवान बिना पैसे दिए भाग गए, और जब मैंने रोका, तो मुझे धक्का मिला। पर अच्छे अनुभव भी बहुत मिले हैं, और वे मुझे आगे बढ़ने की ताकत देते हैं।

प्रश्न: आप ऑटो ड्राइवरों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
उत्तर: हमेशा मोड़ लेने से पहले साइड मिरर देखें। जल्दी-जल्दी ओवरटेक न करें। एक छोटी सी लापरवाही से बड़ी दुर्घटना हो सकती है। हमारा काम सिर्फ गाड़ी चलाना नहीं, बल्कि सबकी सुरक्षा भी है।

प्रश्न: ट्रैफिक पुलिस और उनके जुर्मानों से कैसे निपटें?
उत्तर: ट्रैफिक पुलिस के साथ हमेशा शांति और समझदारी से पेश आना चाहिए। अगर कभी कोई गलती हो जाए या अनावश्यक जुर्माना लगे, तो बिना झगड़ा किए, शांत मन से बात करें। अपने दस्तावेज़ और रसीदें हमेशा साथ रखें ताकि किसी भी गलतफहमी से बचा जा सके।

प्रश्न: अब, सीएनजी के आने के बाद आपकी रोज़ की आमदनी पर क्या असर पड़ा है?
उत्तर: सीएनजी से ईंधन का खर्चा कम हो गया है, जिससे सवारी की फीस किफायती रहती है। लेकिन देश में बेरोजगारी बढ़ने की वजह से कई लोग ऑटो ड्राइविंग कर रहे हैं। इससे ड्राइवरों में मुकाबला बढ़ा है और हमारी आमदनी पर असर पड़ा है। कम खर्चा तो फायदेमंद है, पर ड्राइवरों की संख्या ज्यादा होने से कुल कमाई पर असर होता है।


कैफे सोशल मैगज़ीन से निष्कर्ष:
इस विशेष अंक में हमने उन अनसुने हीरो की कहानी साझा की है, जो बिना किसी शोर-शराबे के हमारे जीवन में उजाला भरते हैं। मुननवार काज़ी जैसी कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि कड़ी मेहनत, ईमानदारी और समर्पण से समाज में सकारात्मक बदलाव आ सकता है। हम मानते हैं कि कुछ ऑटो ड्राइवर अच्छे होते हैं और कुछ में कमी रह जाती है, पर पहली नजर में सभी को एक जैसे नहीं देखा जा सकता। आइए, हम इन मेहनती लोगों का सम्मान करें और हमेशा उनके प्रति आभारी रहें।

Ali Sayed Author - Vice President of Inbook Foundation and Cafe Social Magazine
https://www.instagram.com/cafesocialmagazine/reel/DEXj-gLS0Tg

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