परमवीर चक्र

महावीर चक्र विजेता – श्री दिगेंद्र कुमार परसवाल

ललिता शर्मा नयास्था’
भीलवाड़ा, राजस्थान


जीवन परिचय एवं परिवार
श्री दिगेंद्र कुमार का जन्म 3 जुलाई, 1969 को राजस्थान के सीकर जिले के नीम का थाना तहसील में झालरा जाट गाँव में हुआ। उनके पिता का नाम शिवदान सिंह और माता जी का नाम राजकौर था। पिता श्री शिवदान सिंह आर्य समाज के प्रबल अनुयायी और सक्रिय कार्यकर्ता थे। श्री दिगेंद्र कुमार के पिता देश की स्वतंत्रता एवं जनजागृति के लिए गाँव-गाँव जाकर प्रचार करते थे। वे भजनोपदेशक भी थे। माता राजकौर के पिता जी सुभाषचन्द्र बोस की सेना में थे एवं स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया इसीलिए दिगेंद्र कुमार की शिराओं में भी बहादुरी रक्त बहता था।

*शिक्षा और खेल*
शिक्षा और खेल भावना के वातावरण में पले – बढ़े श्री दिगेंद्र कुमार के सभी भाई – बहन खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शनकर्ता रहे हैं और उनकी बहनों ने तो खेलों में कप्तानी प्रतिनिधित्व भी किया है। श्री दिगेंद्र कुमार भी एक उत्कृष्ट खिलाड़ी रहे हैं। खेलों को समर्पित इस परिवार ने सदैव देश का नाम रोशन किया है। देश के लिए कुछ कर गुजरने की यह चाह श्री दिगेंद्र कुमार के मन में बचपन से ही थी। इसी कारण अपनी आरंभिक शिक्षा पूर्ण होते ही वे भारतीय सेना में शामिल हो गए और भारतीय सेना में अपनी सेवाएं देने लग गए।

सेना में भरती होने का निश्चय
अपने पिता और रहबरे आजम दीनबंधु सर छोटूराम के आह्वान पर वे रेवाडी में जाकर सेना में भर्ती हो गए। पिता की
प्रेरणा से दिगेंद्र कुमार राज राइफल्स में भर्ती हो गए। सेना की हर एक गतिविधि चाहे वह दौड़ हो, निशानेबाजी हो या कोई अन्य कार्य हो, वह सदैव प्रथम ही आते। उनकी इस प्रकार की विविध प्रतिभाओं के कारण उन्हें भारतीय सेना के सर्वश्रेष्ठ कमांडो के रूप में ख्याति मिली।

ऑपरेशन (ऑपरेशन ऑफ पवन) श्री लंका
अक्टूबर 1987 में श्रीलंका में जब उग्रवादियों को खदेड़ने का दायित्व भारतीय सेना को मिला। इस अभियान का नाम था ‘ऑपरेशन ऑफ पवन‘ जो पवनसुत हनुमान के पराक्रम का प्रतीक था। इस अभियान में दिगेंद्र कुमार सैनिक साथियों के साथ तमिल बहुल एरिया में पेट्रोलिंग कर रहे थे। पॉँच तमिल उग्रवादियों ने दिगेंद्र कुमार की पेट्रोलिंग पार्टी के पाँच सैनिकों को फायर कर मौत के घाट उतार दिया और भाग कर एक विधायक के घर में घुस गए। दिगेंद्र कुमार ने बाकी साथियों के साथ पीछा किया और विधायक के घर का घेराव कर दिया।

लिट्टे समर्थक विधायक ने बाहर आकर इसका विरोध किया। दिगेंद्र के फौजी कमांडो ने हवाई फायर किया तो अन्दर से गोलियाँ चलने लगे। एक फौजी ने हमले पर उतारू विधायक को गोली मार दी और पाँचो उग्रवादियों को ढेर कर दिया। एक अन्य घटना में भारतीय सेना के 36 सैनिकों को तमिल उग्रवादियों ने कैद कर लिया। उन्हें छुडाना बड़ा मुश्किल काम था।

टेन पैरा के इन 36 सैनिकों को कैद में 72 घंटे हो चुके थे लेकिन बचाव का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। अफसरों की अनेक बैठकें हुईं और जनरल ने दिगेंद्र कुमार को बुलाकर उसकी योजना सुनाई। दिगेंद्र कुमार ने दुश्मनों से नजर बचाकर नदी से तैर कर पहुँचने की योजना सुझाई। नदी में 133 किलोवॉट का विद्युत तरंग बह रहा था, फिर भी साहस कर दिगेंद्र कुमार ने पीठ पर 50 किलो गोला बारूद, हथियार और साथियों के लिए बिस्कुट पैकेट लिए जो 72 घंटे से भूखे थे।

हिम्मत कर उन्होंने नदी में गोता लगाया। कटर निकाला और विद्युत तारों को काट कर आगे पार हो गये। दिगेंद्र ने वायरलेस से सूबेदार झाबर सही स्थान पता किया। गोलाबारूद और खाने का सामान सूबेदार झाबर को दिया और साथियों को पहुचाने के निर्देश देकर चलता बना। दिगेंद्र से उग्रवादियों के ठिकाने छुपे न थे। वह नदी के किनारे एक पेड़ के पीछे छुप गया और बिजली की चमक में उग्रवादियों के आयुध डिपो पर निशाना साधा। दोनों संतरियों को गोली से उड़ा दिया एवं ग्रेनेड का नाका दांतों से उखाड़ बारूद के जखीरे पर फेंक दिया। जोर-जोर से सैंकडों धमाके हुए, उग्रवादियों में हड़कंप मच गया। दिगेंद्र की हिम्मत देख बाकी कमांडो भी आग बरसाने लगे. थोड़े ही समय में 39 उग्रवादियों को ढेर कर दिया गया। जनरल कलकट ने दिगेंद्र कुमार को खुश होकर अपनी बाँहों में भर लिया। उन्हें बहादुरी का मैडल दिया गया।

1993 में दिगेंद्र कुमार की सैनिक टुकड़ी जम्मू-कश्मीर के अशांत इलाके कुपवाडा में तैनात थी। पहाड़ी इलाका होने और स्थानीय लोगों में पकड़ होने के कारण उग्रवादियों को पकड़ना कठिन था। मजीद खान एक दिन कंपनी कमांडर वीरेन्द्र तेवतिया के पास आया और धमकाया कि हमारे खिलाफ कोई कार्यवाही की तो उसके गंभीर दुष्परिणाम होंगे। कर्नल तेवतिया ने सारी बात दिगेंद्र कुमार को बताई। दिगेंद्र कुमार यह सुन तत्काल मजीद खान के पीछे दौड़े। वह सीधे पहाड़ी पर चढ़े जबकि मजीद खान पहाड़ी के घुमावदार रास्ते से 300 मीटर आगे निकल गया था। दिगेंद्र कुमार ने चोटी पर पहुँच कर मजीद खान के हथियार पर गोली चलाई। गोली से उसका पिस्टल दूर जाकर गिरा।

दिगेंद्र कुमार ने तीन गोलियां चलाकर मजीद खान को ढेर कर दिया। उसे कंधे पर उठाया और मृत शरीर को कर्नल के सम्मुख रखा। पुनः कुपवाडा में इस बहादुरी के कार्य के लिए दिगेंद्र कुमार को सेना मैडल से नवाजा गया।

कारगिल युद्ध
कारगिल युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण काम तोलोलिंग की चोटी पर कब्जा करना था। राजपुताना राइफल्स को यह काम सौंपा गया। जनरल मलिक ने अपनी टुकड़ी से तोलोलिंग पहाड़ी को मुक्त कराने की योजना के विषय में बात की।100 मीटर का रूसी रस्सा चाहिये जिसका वजन 6 किलो होता है और 10 टन वजन झेल सकता है तथा इसके साथ रूसी कीलों की माँग की जो चट्टानों में आसानी से ठोकी जा सकती थीं। रास्ता विकट और दुर्गम था पर दिगेंद्र कुमार के द्वारा दूरबीन से अच्छी तरह जाँचा परखा हुआ था।

सेना में दिगेंद्र कुमार की बहादुरी के किस्से इतने प्रसिद्ध थे कि उन्हें ‘कोबरा‘ नाम से भी पुकारा जाता था। दिगेंद्र उर्फ कोबरा 10 जून 1999 की शाम अपने साथी और सैन्य साज सामान के साथ आगे बढे। कीलें ठोकते गए और रस्से को बांधते हुए 14 घंटे की कठोर साधना के बाद मंजिल पर पहुंचे। 12 जून 1999 को दोपहर 11 बजे जब वे आगे बढ़े तो उनके साथ कमांडो टीम में मेजर विवेक गुप्ता, सूबेदार भंवरलाल भाकर, सूबेदार सुरेन्द्र सिंह राठोर, लांस नाइक जसवीर सिंह, नायक सुरेन्द्र, नायक चमनसिंह, लांसनायक बच्चूसिंह, सी.एम.एच. जसवीरसिंह, हवालदार सुल्तानसिंह नरवारिया एवं दिगेंद्र कुमार थे। पाकिस्तानी सेना ने तोलोलिंग पहाड़ी की चोटी पर 11 बंकर बना रखे थे। दिगेंद्र कुमार ने प्रथम बंकर उड़ाने की हाँ भरी, 9 सैनिकों ने बाकी के 9 बंकर उड़ाने की सौगंध खाई।


11 वां बंकर दिगेंद्र कुमार ने ख़त्म करने का बीड़ा उठाया। कारगिल घाटी में बर्फीली हवा, घना अँधेरा था, दुरूह राहों और बार-बार दुश्मन के गोलों के धमाकों से निडर वे पहाड़ी की सीधी चढान पर बंधी रस्सी के सहारे चढ़ने लगे और अनजाने में वहाँ तक पहुँच गए जहाँ दुश्मन मशीनगन लगाकर बैठा था। वे पत्थरों को पकड़ कर आगे बढ़ रहे थे। अचानक दुश्मन की मशीनगन का बैरल हाथ लगा जो लगातार गोले फेंकते, काफी गर्म हो गया था। सच्चाई का भान होते ही उन्होंने बैरल को निकाल कर एक ही पल में हथगोला बंकर में सरका दिया जो जोर के धमाके से फटा। दिगेंद्र कुमार का तीर सही निशाने पर लगा था। प्रथम बंकर राख हो गया और धूं-धूं कर आग उगलने लगा। पीछे से 250 कमांडो और आर्टिलरी टैंक गोलों की वर्षा कर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे थे। कोबरा के साथियों ने जमकर फायरिंग की लेकिन गोलों ने इधर से उधर नहीं होने दिया। आग उगलती तोपों का मुहँ एक मीटर ऊपर करवाया और आगे बढे।

दिगेंद्र बुरी तरह जख्मी हो चुके थे। दिगेंद्र की एल.एम.जी भी हाथ से छूट गई पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। प्राथमिक उपचार कर बहते खून को रोका। पीछे देखा तो पता लगा सूबेदार भंवरलाल भाकर, लांस नाइक जसवीर सिंह, नायक सुरेन्द्र, नायक चमनसिंह, अन्तिम साँस ले चुके थे। लांसनायक बच्चनसिंह, सुल्तानसिंह, राठोर और मेजर विवेक गुप्ता बहादुरी से दुश्मन का सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। अपने सभी साथियों को खो देने के बाद दिगेंद्र कुमार ने फिर हिम्मत की और 11 बंकरों में 18 हथगोले फेंके। मेजर अनवर खान अचानक सामने आ गया। दिगेंद्र कुमार ने छलांग लगाई और अनवर खान पर झपट्टा मारा। दोनों लुढ़कते-लुढ़कते काफी दूर चले गए।

अनवर खान ने भागने की कोशिश की तो उसकी गर्दन पकड़ ली। दिगेंद्र जख्मी था पर मेजर अनवर खान के बाल पकड़ कर डायगर सायानायड से गर्दन काटकर भारत माता की जय-जयकार की। दिगेंद्र कुमार पहाड़ी की चोटी पर लड़खडाते हुए 13 जून 1999 को सुबह चार बजे वहां तिरंगा झंडा गाड़ दिया।

विशेष पाकिस्तान के साथ युद्ध में पीर बडेसर की पहाड़ी पर साँस की नली में तांबे की गोलियाँ घुस गई जो जीते जी वापिस नहीं निकलवाईं।

महावीर चक्र से सम्मानित
दिगेंद्र कुमार परसवाल एमवीसी, एसएम भारतीय सेना की राजपूताना राइफल्स रेजिमेंट की दूसरी बटालियन के पूर्व सैनिक हैं। कारगिल युद्ध में उनके वीरतापूर्ण कार्यों के लिए 15 अगस्त, 1999 को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

कैफे सोशल मैगजीन ऐसे शूरवीरों को नमन करता है।

ललिता शर्मा नयास्था‘
भीलवाड़ा, राजस्थान, भारत

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