शूरवीरो की गाथा

गुमनाम नायक – अक्कमा चेरियन


कुछ समय बाद वह उस स्कूल की प्रबंधिका बन गई। नौकरी के साथ साथ उन्होंने एलटी की उपाधि प्राप्त की।
सन् १९३८ में महात्मा गांधी के द्वारा चलाए जा रहे आंदोलनों से प्रभावित होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और वह त्रावनकोर महिला कांग्रेस में शामिल हो गयी।यह महात्मा गांधी की भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रांतीय ईकाई थी। कुछ समय बाद ब्रिटिश सरकार ने इस संस्था को प्रतिबंधित कर दिया। केरल में स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व मुख्य रूप से त्रावनकोर राज्य कांग्रेस ने किया था।और दल के नेताओ को जेल भेज दिया। पार्टी के अध्यक्ष कुट्टनाड रामकृष्ण पिल्लई‌ को गिरफ्तार कर लिया गया तब पार्टी की कमान उन्होंने चेरियन को सोंप दी।

चेरियन धीरे धीरे त्रावनकोर की राजनीति में प्रसिद्ध हो गई। सन् १९३८ में उन्हें देश सेविका संघ को संगठित करने का कार्य सोंपा गया। उन्होंने पूरे देश में यात्रा कर महिलाओं को इससे जुडने का आह्वान किया।उन्होंने कुछ समय के बाद एक महारैली का आयोजन कर लोगों को इकट्ठा किया।यह रैली त्रावनकोर के शाही महल के बाहर २३ अक्टूबर १९३८ को आयोजित की गई थी।इस रैली में शामिल लोगों की भीड़ देख कर ब्रिटिश के आदेश पर पुलिस चीफ ने गोलियां चलाने का आदेश दिया तब चेरियन ने उसको ललकारते हुए कहा कि रुकों, में इन सबकी नेता हूं। पहली गोली मेरे पर चलाएं। और यह प्रर्दशन तब तक चलता रहेगा जब तक उनके नेताओं को रिहा नहीं किया जाता। आखिर में पुलिस ने सभी आंदोलनकारियों एवं नेताओं को रिहा करने की बात कही तब जाकर यह प्रर्दशन रुका।

अक्कम्मा चेरियन की बहादुरी और साहस की चर्चा पूरे देश में फेल गई।जब महात्मा गांधी तक उनकी बहादुरी की बात पहुंची तब गांधी जी ने उन्हें “त्रावनकोर की झांसी की रानी” कहकर संबोधित किया ।

सन् १९३९ में प्रांतीय कांग्रेस अधिवेशन में वह अपनी बहन के साथ शामिल हुई थीं।इस अधिवेशन में उन्हें अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ समय जेल में रहने के बाद उन्हें रिहा कर दिया। सन् १९४२ में वह प्रांतीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। मुंबई में भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने बुलंद आवाज के साथ भाग लिया। देश जब आजाद हुआ तो १९४७ में हुए पहले चुनाव में वह विधानसभा सभा के लिए चुनी गई। सन् १९६७ में सक्रिय से संन्यास ले लिया।। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी पेंशन सलाहकार बोर्ड के सदस्य के रूप में काम किया।

सन् १९८२ में तिरुवनंतपुरम में उनका निधन हो गया।
कैफे सोशल इस वीर साहसी महिला को शत् शत् नमन करता है।

त्रावनकोर की झांसी की रानी के नाम से प्रसिद्ध अक्कमा चेरियन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान दिया था। त्रावनकोर के नसरानी परिवार में अक्कमा चेरियन का जन्म सन् १४ फरवरी १९०९ को हुआ था। उनके पिता का नाम थामसन चेरियन एवं मां का नाम अन्नाममा करिपापांरबिल था।उनकी एक बड़ी बहन थी। चेरियन ने कंजिरापल्ली स्थित सरकारी गर्ल्स हाई स्कूल से पढ़ाई की और आगे की पढ़ाई सेंट जोसेफ हाईस्कूल चांगनाचेरी से की। उन्होंने टेरेसा कालेज से इतिहास में स्नातक किया था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपने केरियर की शुरुआत सन् १९३१ में मैरी माध्यमिक विद्यालय में शिक्षिका से की।

संजीव जैन
संपादक – मंडल
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