हिंदी प्रतियोगिता

टोक्यो ओलंपिक में भारत का प्रदर्शन

आखिरी दिन, आखिरी मैच, और गोल्ड जीतने की आखिरी उम्मीद! जी नहीं, सुनने में जितना रोमांचक लगता है वास्तव में उससे कई अधिक उत्सुकता, कौतूहल और नाटकीयता से भरपूर।

यद्यपि इससे पहले भी भारतीय जनता की टोक्यो ओलंपिक के प्रति उत्सुकता में कोई कमी थी। आखिर पहली बार भारत ने किसी ओलंपिक श्रृंखला के पहले ही दिन सिल्वर मेडल जीता था। कुछ देर के लिए ही सही लेकिन मीराबाई चानू ने भारत को टोक्यो ओलंपिक की तीन सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शक-टीम में शुमार कर दिया।

अदिति अशोक ने प्रायः सभी मैच में द्वितीय और तृतीय स्थान पर स्थाई रहकर और काँटे की टक्कर देकर भारत की गोल्फ में अब तक की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति पेश की।
लवलीना बोरगोहैँ ने बॉक्सिंग में कांस्य पदक जीत मैरी कॉम की परम्परा को आगे बढ़ाया। तो वही भारतीय महिला हॉकी ने जब विश्व विजेता टीम के दांत खट्टे कर दिए तब हर भारतीय का दिल चक दे पर झूम गया।
पुरुष हॉकी टीम के हाथ में ओलंपिक पदक देखने के लिए भारत ने कितना इंतज़ार किया, ये तो वे करोड़ों धड़कनें ही समझ सकती हैं, जिनके हृदय में हिन्द धड़कता है।
रवि दहिया में तो मानो भारत का जीवंत रूप ही निखर कर आ गया था। वही मासूमियत, वही एकाग्रता, और वही छल का सबल तथापि शांतिपूर्ण विरोधकुश्ती में प्रतिद्वंद्वी को दांतों से चोट पहुँचाना नियमों के विरुद्ध है, फिर भी एक विश्वस्तरीय खिलाड़ी द्वारा ऐसे अनैतिक व्यवहार ने रवि और भारत की पहचान में सिल्वर मेडल सहित चार चांद ही लगाये।
पी.वी. सिंधु के पदक ने तो टोक्यो में इतिहास ही रच दिया। पहली बार किसी भारतीय महिला ने दो व्यक्तिगत ओलंपिक मेडल जीते और देश का मान बढ़ाया।

यही नहीं, जूनियर खिलाड़ियों में सौरभ चौधरी और मनु भाकेर ने अपने कौशल से ये साबित कर दिया कि भारतीय भविष्य की बागडोर उज्ज्वल हाथों में है।

निस्संदेह, अब तक का ये भारत का सबसे सफल ओलम्पिक रहा। सबके हृदयों में प्रेम,वाणी में नवेली मिठास और चेहरे पर मुस्कान झलक रही थी। पर मानो उस आनन्द में कुछ कमी थी। अब भी एक आस, एक प्यास थी जो अधूरी थी। सोने की चिड़िया को सोने की भेंट चढ़ना अभी बाकी था।
इसीलिए, वह आखिरी दिन, सांझ ढलता आखिरी मैच, और टोक्यो ओलंपिक में भारत के गोल्ड जीतने की आखिरी उम्मीद को बेहतर वर्णनातीत ही कहिये। पर वो कहते है न, आशा पर आसमान टिका है।

शाम के साढ़े चार बजे हैं। टी.वी. पर चल रहा है वो आखिरी मैच।
यहाँ मैं जेवलिन के नियम समझने का प्रयास कर रही थी, वहाँ पापा गोल्ड जीतने की होड़ में हर थ्रो पर प्रसाद में नारियल की संख्या बढ़ाते जा रहे थे। और माँ भोजन परोसते हुए मन्त्र जपती जाती थीं। न जाने वह कौन सा धागा था जिसने उस एक पल में समस्त भारतवासियों को एक सुंदर माला का रूप देकर भारत माँ के चरणों में अर्पित कर दिया था। और करोड़ों धड़कनों का समर्पण मानो स्वीकार हो गया।

“चक्क दे!!! नीरज चोपड़ा ने भारत को गोल्ड जिता दिया।” शोर से सारी गली, मोहल्ले, देश और दुनिया गूँज गई।
बरसों की मेहनत और अरबों धड़कनों की दुआ एक साथ रंग लाई, और साथ में एक अनूठी सौगात लायी।
पहली बार टोक्यो ओलंपिक में भारत का राष्ट्रगान सुनाई दिया। तिरंगा गर्व से आसमान छू गया। और “हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा” अमर वाक्य चरितार्थ हो गया।
इतना सब हुआ ही था कि मेरी छोटी बहन ने कौतुक से मेरे पास आकर प्रश्न किया- “क्यों दीदी सब इतना खुश क्यों हो रहे हैं?”
“नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड जीता है छोटी”, मैंने गर्व से उसे उत्तर दिया।
अच्छा तो क्या इसीलिए उस गाने में गाते हैं- मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती?” उसने भोलेपन से पूछा।
“हाँ! बिल्कुल इसीलिए गाते हैं।” मैंने नम आँखों को पोंछते हुए प्यार से उसका माथा चूम लिया।

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