हिंदी प्रतियोगिता

कोविद 19 का विश्व पर दुष्प्रभाव

                     “दो गज दुरी मास्क है जरुरी”

      ऑक्सीजन के सहारे टिकी अनगिनत सांसें और कोरोना के शिकार हुए लोगों की लाशों के अम्बार के बीच हमें इस वैश्विक महामारी का विनाशकारी प्रभाव केवल मानव जीवन और उसके स्वास्थ्य के साथ ही अर्थव्यवस्था तथा नागरिक असुविधाओं और कष्टों पर ही नजर आ रहा है। जबकि इस महामारी ने हमारा सदियों के अनुभवों और आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित सामाजिक तानाबाना और व्यवहार भी उतना ही नुकसान पहुंचा दिया है।

    महामारी से बचने के लिए बनाई गई सामाजिक दूरियों ने न केवल मित्रों और रिश्तेदारों को दूर कर दिया बल्कि माता-पिता और पुत्र-पुत्रियों के बीच तथा भाई-बहनों के बीच भी खौफ तथा अलगाव की दीवार खड़ी कर दी है। असीमित विश्व की सीमाएं सिमट कर हमारे दरवाजे तक आ गई हैं।

महामारी से सामाजिक रिश्तों को अपूर्णीय क्षति :

      सोशल डिस्टेंसिंग से बढ़ी रिश्तों में दूरियां धरती पर सबसे ताकतवर मानव शत्रु साबित हो रहे कोरोना पर भी मानव जल्दी ही विजय पा लेगा। लेकिन संकट से जूझ रही मानवता के जेहन में कोरोना के बाद की दुनिया और उसकी नयी व्यवस्थाओं के प्रति अभी से जिज्ञासा उत्पन्न होने के साथ ही एक सवाल यह भी उठ रहा है कि इस महामारी ने हमारे सामाजिक रिश्तों को जो अपूर्णीय क्षति पहुंचाई है, उसकी भरपाई कैसे होगी और’ संकट के बाद का समाज कैसा होगा’? प्रकृति की इस मार के आगे फिलहाल विज्ञान भी लाचार है, इसलिए “सोशल डिस्टेंसिंग” के सिद्धांत को लागू किया जा रहा है।

   इस अलगाव के कारण मानवता उस दिशा में बढ़ रही है जहां पर सीमाएं हमारे घरों के दरवाजों तक आ गई हैं। इंसानों की प्रकृति बीमारों के नजदीक जाने और उस पर दया प्रकट करने की रही है, लेकिन इस कोरोना वायरस ने इंसानों की इस सबसे अच्छी प्रवृति पर भी हमला कर दिया है।

खुशी और गम में भी लोग पास नहीं आ रहे लोग पहले खुशी और गम के मौकों पर इकट्ठे हो ही जाते थे। इन दोनों ही अवसरों पर देश विदेश में रहने वाले रिश्तेदार एकत्र हो कर खुशी और गम के भागीदार बनते थे। आज कोरोना मरीजों की कुशल क्षेम जानने के लिए मरीज के पास जाना तो रहा दूर उसकी मौत हो जाने पर भी करीबी लोग मृतक के शव के पास नहीं जा रहे हैं।मृतक का दुखी परिवार स्वयं को अकेला, बेगाना महसूस कर रहा है। ऐसे परिवारों को ढांढस बंधाने वाला भी कोई नहीं है। शव के पास जाना तो रहा दूर गमी के मौके पर निकट रिश्तेदार भी मृतक के परिवार को सान्त्वना देने नहीं जा रहे हैं। डर के मारे लोग मृतक के घर के पास तक नहीं फटक रहे हैं।मृतक का दुखी परिवार स्वयं को अकेला, बेगाना महसूस कर रहा है। ऐसे परिवारों को ढांढस बंधाने वाला भी कोई नहीं है। मरीजों से जीते जी छुआछूत तो हो ही रही है, लेकिन मरने के बाद भी ‘उसका पार्थिव शरीर उठाने के लिए चार कन्धे मिलना भी कठिन हो गया है’। उत्तर प्रदेश और बिहार में हजारों शव बिना अंतिम संस्कार के गंगा नदी में बहा दिए गए। कुछ स्थानों पर हिन्दुओं के शव भी दफना दिए गए।

    अंतिम संस्कार सेे भी वंंचित,  खंडित व बिखरा समाज

सनातन धर्म के 16 संस्कारों में से दाह संस्कार को अंतिम संस्कार माना जाता है और कुछ अन्य संस्कारों को चाहे कोई माने या न माने मगर इस संस्कार के बिना शवदाह करने को अधोगति माना जाता है। कुछ मृतकों की सन्तानें अस्पताल में अपने माता पिता के शव लावारिस छोड़ कर भाग गईं।

कुछ स्थानों पर कोरोना से मरे लोगों के शव लेने उनके परिजनों के न आने पर मुस्लिम युवकों ने मानवता का परिचय देते हुये शवों का दाह संस्कार किया। त्योहारों में खुशियां बांटना गले मिलना भूल गए लोग युगों-युगों से सम्पूर्ण विश्व में विभन्न धर्मावलम्बियों और संस्कृतियों के लोग सालभर किसी न किसी बहाने त्यौहार मनाकर अपने जीवन में खुशियां भरने का प्रयास करते आए हैं।

त्योहार खुशियां बांटने के लिए ही होते हैं। ईद और होली जैसे गले मिलने वाले त्योहार तो खुशियां बांटने के साथ ही आपसी सौहार्द एवं भाईचारे की प्रतिबद्धता प्रकट करने के लिए होते हैं। जब से कोरोना का हव्वा खड़ा हुआ तब से होली बेरंग और ईद बंगानी हो गया। गले मिलना तो रहा दूर लोग एक दूसरे के निकट खड़े होने में भी डर रहे हैं।मनुष्य के बिना समाज और समाज के बिना मनुष्य के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। 

         भारत में विभिन्न धर्मों की भी हजारों की संख्या में जातियां और उपजातियां हैं। संविधान में वर्णित जनजातियों की संख्या भी 7 सौ से अधिक है, जिनकी सैकड़ों उपजातीय शाखाएं हैं और इन सभी के विभिन्न रस्मों रिवाजों के साथ ही भिन्न-भिन्न त्योहार होते हैं। अगर भारत सरकार की अवकाश की सूची पर गौर करें तो उसमें 36 प्रमुख त्योहारों का उल्लेख है। लेकिन कोरोना महामारी ने लोगों के प्रियजनों और मित्रजनों को छीनने के साथ ही त्योहारों का उल्लास और उनके पीछे छिपी मान्यताओं को भी छीन लिया है। आपस में सुख-दुख बांटने के साथ ही सामुदायिकता और सहयोग की भावना भी कोरोना संक्रमित हो रही है।

     भारत में 2020 कोरोनावायरस महामारी का आर्थिक प्रभाव काफी हद तक विघटनकारी रहा है।सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2020 की चौथी तिमाही में भारत की वृद्धि दर घटकर 3.1% रह गई। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि भारतीय अर्थव्यवस्था -4.5 की दर से सिकुड़ जायेगी।भारत में कोरोनावायरस महामारी का आर्थिक प्रभाव

मार्च 2020 – वर्तमान

कारण :कोरोना महामारी की वजह से बाजार में अस्थिरता और लॉकडाउन

 परिणाम:

  •  बेरोजगारी में तीव्र बढ़त
  •  आपूर्ति श्रृंखलाओं पर तनाव
  •  सरकारी आय में कमी
  •  पर्यटन उद्योग का पतन
  •  आतिथ्य उद्योग का पतन
  •  उपभोक्ता गतिविधि में कमी
  •  ईंधन की खपत में गिरावट। एलपीजी की बिक्री में वृद्धि।

      24 मार्च को नरेन्द्र मोदी द्वारा 21 दिनों की अवधि के लिए उस दिन की मध्यरात्रि से देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा हुई। उन्होंने यह भी कहा कि “लॉकडाउन जनता कर्फ्यू की तुलना में सख्त लागू किया जाएगा”।

     कोरोनावायरस के कारण पूरे देश में लाॅकडाउन होने के कारण कई सरकारी व्यवसाय और उद्योग प्रभावित हुए हैं। घरेलू आपूर्ति और मांग प्रभावित होने के चलते आर्थिक वृद्धि दर प्रभावित हुई है। वहीं जोखिम बढ़ने से घरेलू निवेश में सुधार में भी देरी होने की संभावना दिख रही है। विश्व बैंक के अनुसार इस महामारी की वजह से भारत ही नहीं बल्कि समूचा दक्षिण एशिया गरीबी उन्मूलन से मिलें फायदे को गँवा सकता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ ने कहा है कि कोरोना वायरस सिर्फ़ एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट नहीं रहा, बल्कि ये एक बड़ा लेबर मार्केट और आर्थिक संकट भी बन गया है जो लोगों को बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगा। लॉकडाउन का सबसे ज़्यादा असर अनौपचारिक क्षेत्र पर पड़ा है और हमारी अर्थव्यवस्था का 50 प्रतिशत जीडीपी अनौपचारिक क्षेत्र से ही आता है, ऐसे में ये क्षेत्र लॉकडाउन के दौरान काम नहीं कर पा रहे, वो कच्चा माल नहीं ख़रीद पा रहे और बनाया हुआ माल बाज़ार में नहीं बेच पा रहे जिससे उनकी कमाई बंद सी पड़ गई। कोरोनावायरस दुनिया में कहीं और की तुलना में भारत में तेजी से फैल रहा है, 

 अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सार्वजनिक वित्त को लेकर खींचतान के बीच कोरोनावायरस मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है और मुद्रास्फीति बढ़ने का मतलब है कि सुधार जल्दी नहीं हो सकती है। कुछ का कहना है कि अर्थव्यवस्था में मार्च 2021 के माध्यम से वर्ष में लगभग 10 प्रतिशत का संकुचन देखा जा सकता है। लाॅकडाउन के शुरू के दिनो में वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने देश में 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को साकार करने के लिए घरेलू उद्योग को अधिक आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया था।

लॉकडाउन के दौरान अनुमानित 14 करोड़ लोगों ने रोजगार खो दिया जबकि कई अन्य लोगों के लिए वेतन में कटौती की गई थी। देश भर में 45% से अधिक परिवारों ने पिछले वर्ष की तुलना में आय में गिरावट दर्ज की है। पहले 21 दिनों के पूर्ण लॉकडाउन के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था को हर दिन 32,000 करोड़ से अधिक की हानि होने की आशंका थी। पूर्ण लॉकडाउन के तहत भारत के $2.8 ट्रिलियन आर्थिक संरचना का एक चौथाई से भी कम गतिविधि कार्यात्मक थी। अनौपचारिक क्षेत्रों में कर्मचारी और दिहाड़ी मजदूर सबसे अधिक जोखिम वाले लोग हैं। देश भर में बड़ी संख्या में किसान जो विनाशशील फल-सब्जी उगाते हैं, उन्हें भी अनिश्चितता का सामना करना पड़ा। महामारी से ठीक पहले, सरकार ने कम विकास दर और कम मांग के बावजूद 2024 तक अर्थव्यवस्था को अनुमानित $2.8 ट्रिलियन से $5 ट्रिलियन तक बदलने का लक्ष्य रखा था।

सुधार के प्रयास संपादित करें

भारत सरकार ने स्थिति से निपटने के लिए कई उपायों की घोषणा की जिनमें खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और राज्यों के लिए अतिरिक्त धन और कर चुकाने की समय सीमा बढ़ाना। 26 मार्च को गरीबों के लिए कई तरह के आर्थिक राहत उपायों की घोषणा की गई जो कुल 1,70,000 करोड़ से अधिक थे।अगले दिन भारतीय रिजर्व बैंक ने भी कई उपायों की घोषणा की जो देश की वित्तीय प्रणाली को 3,74,000 करोड़ उपलब्ध कराएंगे। साथ ही भारतीय रिज़र्व बैंक ने अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए मार्च के बाद से प्रमुख ब्याज दरों में 115 आधार अंकों (1.15 प्रतिशत अंक) की कमी की है। विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक ने कोरोनावायरस महामारी से निपटने के लिए भारत को समर्थन को मंजूरी दी।

       12 मई को प्रधान मंत्री ने राष्ट्र के नाम एक संबोधन में ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ की घोषणा की। इसमें समग्र आर्थिक पैकेज के रूप में 20 लाख करोड़ का पॅकेज घोषित किया गया। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 10% है। हालांकि यह प्रधानमंत्री द्वारा 12 मई को घोषित किया गया था लेकिन इसमें आरबीआई की घोषणाओं सहित पिछले सरकारी राहत पॅकेज को शामिल किया गया था। 15 मार्च को बेरोजगारी दर 6.7% थी जो 19 अप्रैल को बढ़कर 26% हो गई। फिर मध्य जून तक पूर्व-लॉकडाउन स्तर पर वापस आ गई।नरेंद्र मोदी द्वारा मई में घोषित जीडीपी के 10 प्रतिशत के बराबर एक प्रोत्साहन पैकेज, जिसमें बैंक ऋण पर क्रेडिट गारंटी और गरीबों को मुफ्त अनाज शामिल हैं। इस पर कई अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि उस समर्थन का अधिकांश हिस्सा पहले से ही सरकार द्वारा बजट में लिया गया था और इसमें बहुत कम खर्च शामिल था।

       केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 26 नवंबर 2021, सुबह 8:00 बजे तक जारी आंकड़ों के मुताबिक देश में मामलों की संख्या बढ़कर 345,55,431 पर पहुंच चुकी है। इस संक्रमण से अब तक 467,468 लोगों की मृत्यु हो चुकी है जबकि देश भर में 339,77,830 मरीज ठीक हो चुके हैं।

          South Africa Coronavirus Variant Omicron: दक्षिण अफ्रीका में इस हफ्ते सामने आए कोरोना वायरस के नए वेरिएंट ‘ओमीक्रॉन’ (B.1.1.529) ने दुनियाभर के लिए चिंता पैदा कर दी है। फिर से अगर विश्व को इस महामारी से जूझना पड़ा तो सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणाम तो बहुत होंगे पर अब मानसिक दुष्परिणाम का प्रभाव बहुत ज्यादा होगा क्योंकि पिछला महामारी का हर पल भूल कर लोगों ने नए सिरे से जीने के लिए कमर कस ली थी अब कहीं जाकर स्कूल मैं बच्चों की किलकिलाट, तीज त्योहारों में रोनक सी आ रही थी। मार्केट में व्यवहार जोर शोर पकड़ रहे थे अब ना आए यह महामारी, महामारी के इतने दुष्परिणाम तो किसी भी महामारी में नहीं हुए थे। कोरोना महामारी ने हरे की कमर तोड़ दी है। उम्मीद लगाकर चल रहा है यह जमाना क्या हम भी इस पर विजय प्राप्त करेंगे हर आएंगे 1 दिन इस महामारी को……….

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